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Allama Iqbal Shayari – Meaning & Explanation

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By Author: BANJIT DAS
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अल्लामा मुहम्मद इक़बाल (Allama Iqbal) उर्दू और फ़ारसी साहित्य के उन महान कवियों में से हैं, जिन्होंने सिर्फ़ शायरी नहीं लिखी, बल्कि एक पूरी सोच, दर्शन और आत्मिक चेतना को शब्दों में ढाला। उन्हें शायर-ए-मशरिक़ (पूरब का कवि) कहा जाता है। उनकी शायरी केवल प्रेम या सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें खुदी (Selfhood), खुदा, इंसान की पहचान, आत्म-सम्मान, जागृति, इस्लामी दर्शन और सामाजिक क्रांति जैसे गहरे विषय मिलते हैं।

यह लेख Allama Iqbal Shayari – Meaning & Explanation विषय पर आधारित ...
... है, जिसमें हम उनकी मशहूर शायरियों को सरल हिंदी में अर्थ और विस्तृत व्याख्या के साथ समझेंगे। यह लेख छात्रों, साहित्य प्रेमियों और उन सभी के लिए उपयोगी है जो इक़बाल की शायरी को गहराई से समझना चाहते हैं।

अल्लामा इक़बाल का जीवन परिचय (संक्षेप में)

अल्लामा इक़बाल का जन्म 9 नवंबर 1877 को सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। वे न केवल एक महान कवि थे, बल्कि दार्शनिक, विचारक और राजनेता भी थे। उन्होंने लाहौर, कैम्ब्रिज और जर्मनी से शिक्षा प्राप्त की। उनकी रचनाओं ने भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों में आत्म-सम्मान और नई चेतना जगाई।

इक़बाल की प्रमुख कृतियाँ हैं:

बांग-ए-दराबाल-ए-जिब्रीलज़र्ब-ए-कलीमअसरार-ए-खुदीरुमूज़-ए-बेखुदी

इक़बाल की शायरी का केंद्रीय विचार: “ख़ुदी”

इक़बाल की शायरी का सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध विचार है ख़ुदी। ख़ुदी का अर्थ केवल अहंकार नहीं, बल्कि आत्म-चेतना, आत्म-सम्मान और अपने अस्तित्व को पहचानना है। इक़बाल के अनुसार इंसान जब अपनी ख़ुदी को पहचान लेता है, तभी वह ईश्वर के सबसे क़रीब होता है।

शायरी:

"ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।"

अर्थ:

इंसान को अपने आत्मबल और आत्मविश्वास को इतना ऊँचा बनाना चाहिए कि किस्मत भी उसके सामने झुक जाए और खुदा भी उससे उसकी इच्छा पूछे।

व्याख्या:

यह शेर इक़बाल के दर्शन का मूल है। यहाँ वे इंसान को कमजोर और लाचार नहीं मानते, बल्कि उसे एक शक्तिशाली प्राणी बताते हैं। अगर इंसान अपनी ख़ुदी को पहचान ले, मेहनत करे और आत्म-सम्मान के साथ जिए, तो वह अपने भाग्य का निर्माता स्वयं बन सकता है।

इक़बाल की शायरी में युवाओं का संदेश

इक़बाल युवाओं को कौम की रीढ़ मानते थे। उनकी शायरी में नौजवानों के लिए विशेष संदेश है – उठो, जागो और अपने भीतर की शक्ति को पहचानो।

शायरी:

"उठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो, काख़-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो।"

अर्थ:

हे नौजवानों! गरीबों को उनकी ताकत का एहसास दिलाओ और अमीरों के महलों की नींव हिला दो।

व्याख्या:

इस शेर में इक़बाल सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं। वे चाहते हैं कि युवा वर्ग अन्याय, शोषण और असमानता के विरुद्ध खड़ा हो और समाज में परिवर्तन लाए।

अल्लामा इक़बाल और इस्लामी चेतना

इक़बाल की शायरी में इस्लाम केवल एक धर्म नहीं, बल्कि एक जीवंत जीवन प्रणाली है। वे मुसलमानों को उनके गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं और भविष्य के लिए तैयार करते हैं।

शायरी:

"वो ज़माने में मआज़ूर थे मुसलमाँ होकर, और तुम ख़्वार हुए तारीख़-ए-क़ुराँ होकर।"

अर्थ:

पहले मुसलमान होते हुए भी लोग मजबूर थे, लेकिन आज तुम क़ुरआन होते हुए भी अपमानित हो।

व्याख्या:

इक़बाल यहाँ मुसलमानों की गिरती हुई स्थिति पर चिंता जताते हैं। उनका कहना है कि मुसलमानों ने क़ुरआन की शिक्षाओं को छोड़ दिया, इसलिए वे पतन का शिकार हुए।

इंसान और ईश्वर का संबंध

इक़बाल की शायरी में इंसान और खुदा का रिश्ता बहुत गहरा और आत्मिक है। वे इंसान को खुदा से डरने वाला नहीं, बल्कि उससे प्रेम और संवाद करने वाला मानते हैं।

शायरी:

"यक़ीं पैदा कर ऐ नादाँ, यक़ीं से हाथ आती है, वो दरवेशी कि जिसके सामने झुकती है फ़क़ीरी।"

अर्थ:

हे नासमझ! अपने भीतर विश्वास पैदा कर, क्योंकि विश्वास से ही वह शक्ति मिलती है जिसके आगे गरीबी भी झुक जाती है।

व्याख्या:

यह शेर आत्म-विश्वास और ईमान की ताकत को दर्शाता है। इक़बाल के अनुसार सच्चा विश्वास इंसान को हर कठिनाई से ऊपर उठा देता है।

इक़बाल की शायरी में बाज़ (शाहीन) का प्रतीक

इक़बाल ने शाहीन (बाज़) को आदर्श युवा का प्रतीक बनाया। बाज़ ऊँची उड़ान भरता है, अकेला रहता है और शिकार खुद करता है।

शायरी:

"नहीं तेरा नशेमन क़सर-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर, तू शाहीन है, बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों पर।"

अर्थ:

तुम्हारा स्थान राजमहलों में नहीं, बल्कि ऊँचे पहाड़ों पर है, क्योंकि तुम बाज़ हो।

व्याख्या:

यहाँ इक़बाल युवाओं को आलस्य, आराम और गुलामी से दूर रहने की सीख देते हैं। वे चाहते हैं कि युवा स्वतंत्र, साहसी और ऊँचे लक्ष्य वाले हों।

इक़बाल की शायरी में आत्मसम्मान

शायरी:

"ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें, जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें।"

अर्थ:

ग़ुलामी की हालत में तलवार और चालाकी काम नहीं आती, लेकिन विश्वास की इच्छा पैदा हो जाए तो ज़ंजीरें खुद टूट जाती हैं।

व्याख्या:

यह शेर आज़ादी और आत्म-सम्मान का संदेश देता है। इक़बाल के अनुसार मानसिक गुलामी सबसे खतरनाक होती है।

इक़बाल की शायरी का आधुनिक महत्व

आज के समय में भी अल्लामा इक़बाल की शायरी उतनी ही प्रासंगिक है। आत्मविश्वास की कमी, पहचान का संकट और नैतिक पतन जैसे मुद्दों का समाधान इक़बाल की शायरी में मिलता है।

उनकी शायरी हमें सिखाती है:

खुद को कमजोर न समझेंअपनी पहचान बनाएँज्ञान, कर्म और विश्वास को अपनाएँअन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएँ

निष्कर्ष

अल्लामा इक़बाल की शायरी केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-दर्शन है। उनकी रचनाएँ इंसान को यह एहसास कराती हैं कि वह केवल परिस्थितियों का शिकार नहीं है, बल्कि अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। इक़बाल ने अपनी शायरी के माध्यम से इंसान को आत्म-चेतना (ख़ुदी) का पाठ पढ़ाया और बताया कि जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं पहचानेगा, तब तक वह न तो समाज में सम्मान पा सकता है और न ही ईश्वर के क़रीब पहुँच सकता है।

समग्र रूप से देखा जाए तो Allama Iqbal Shayari – Meaning & Explanation हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि इक़बाल की शायरी केवल साहित्य नहीं, बल्कि एक आंदोलन है — आत्म-जागरण का आंदोलन। उनकी शायरी हमें निराशा से आशा की ओर, कमजोरी से ताक़त की ओर और अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाती है। यदि हम इक़बाल के विचारों और शायरियों के अर्थ को अपने जीवन में उतार लें, तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन बेहतर हो सकता है, बल्कि समाज और राष्ट्र भी एक नई दिशा पा सकते हैं।

अंततः, अल्लामा इक़बाल की शायरी आज भी हमें यह संदेश देती है कि उठो, सोचो, समझो और अपनी ख़ुदी को पहचानो — क्योंकि यही पहचान इंसान को इंसान बनाती है।

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